सोमवार, 23 मार्च 2009

वेदना के अनसुने स्वर

पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान से छह हजार हिंदू जान और इज्जत बचाकर भारत आए हैं। इन परिवारों की आप बीती रोंगटे खड़ी करती है। वे सरकारी नौकरियों में जा नहीं सकते, घर की इज्जत भी हर वक्त खतरे में रहती है। दहशत की जब अति हो गई, सांस लेना दूभर हो गया तब उन्होंने सदियों से चला आ रहा घर और कामकाज छोड़कर भारत आने का निर्णय क्यों किया? यह बात यहां का कोई राजनीतिक दल समझ सकेगा? पाकिस्तानी हिंदुओं की जो पीढ़ी भारत आई है वह भारत से उतनी ही अजनबी है जितनी वह बांग्लादेश या इंग्लैंड से होगी। वे भारत इसलिए आते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां उन्हें सुरक्षा मिलेगी। इस पृथ्वी पर कहींभी कभी भी यदि हिंदुओं को कोई कष्ट होता है तो वे भारत माता की गोद मंें आ दुबकते हैं-चाहे उनका पासपोर्ट किसी भी देश का क्यों न हो। पर उन चैनलों और मीडिया के अन्य साधनों के लिए पाकिस्तानी हिंदुओं की व्यथा कथा महत्वहीन ही रही जिन्होंने मंगलूर में एक पब की घटना को दुनिया भर में हिंदुओं का चेहरा विकृत दिखाने के लिए तूफान की तरह फैला दिया था। भारत का कौन-सा राजनीतिक दल ऐसा है जो हिंदू व्यथा पर आक्रोश व्यक्त करने या हिंदू रक्षा के लिए वोट बैंक और चुनावी जीत-हार के पेंच भूलकर खड़ा हो? हिंदू हित के बारे में असंदिग्ध निष्ठा और असमझौतावादी दृढ़ता से समाज को खड़ा करने में स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, श्री अरविंद, डा. हेडगेवार ही नहीं, गांधीजी और डा. लोहिया का भी अप्रतिम योगदान है। 23 मार्च को डा. राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी शुरू हो रही है। आज की राजनीति में विभिन्न दलों में ऐसे प्रमुख नेता हैं जो स्वयं को लोहिया जी का विचार अनुगामी कहने में संकोच नहीं करते। इनमें मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे आज के लोकप्रिय नेता भी शामिल हैं। यहां मैं 12 अप्रैल, 1964 को डा. राममनोहर लोहिया तथा तत्कालीन जनसंघ के नेता पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा संयुक्त रूप से जारी बयान का एक अंश दे रहा हूं। दो भिन्न विचारों के दलों के नेताओं का यह संयुक्त बयान आज के युग में एक अचंभा ही माना जाएगा। उस बयान में कहा गया था-पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर हुए दंगों ने दो लाख से अधिक हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को भारत आने पर मजबूर किया है। पूर्वी बंगाल में हुई घटनाओं से स्वाभाविक रूप से भारतीयों में उत्तेजना है। हमारा यह दृढ़ मत है कि पाकिस्तान के हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी देना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। इस मामले में निरा कानूनी दृष्टिकोण लेते हुए यह कहना कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू पाकिस्तानी नागरिक हैं, खतरनाक होगा। जहां तक भारतीय मुसलमानों का संबंध है, हमारा यह दृढ़ मत है कि अन्य सभी नागरिकों के समान सभी परिस्थितियों में उनके जीवन और संपत्ति की रक्षा की जानी चाहिए। कोई भी घटना या तर्क इस सच्चाई से समझौता करने को सही नहींठहरा सकते। एक राज्य जो अपने नगारिकों को जीने के अधिकार की गारंटी नहींदे सकता और ऐसे नागरिक जो अपने पड़ोसियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते, बर्बर ही कहलाएंगे। हमारा यह मानना है कि दो भिन्न देशों के रूप में पाकिस्तान का अस्तित्व एक कृत्रिम स्थिति है। दोनों सरकारों के संबंध में मनमुटाव असंतुलित दृष्टिकोण और टुकड़ों में बात करने की प्रवृत्ति का परिणाम है। दोनों सरकारों के बीच चलने वाला संवाद टुकड़ों में न होकर निष्पक्षता से होना चाहिए। खुले दिल से होने वाली ऐसी बातचीत से ही विभिन्न समस्याओं का समाधान निकल सकता है, सद्भावना पैदा की जा सकती है और किसी प्रकार के भारत-पाकिस्तान महासंघ बनाने की दिशा में शुरुआत की जा सकती है। इन दोनों महानायकों के अनुयायी क्या आज पैंतालिस साल बाद साथ मिलकर यह बयान दोबारा जारी कर सकेंगे? पिछले दिनों पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ भारत आए थे। एक साहसी पत्रकार प्रेरणा कौल ने मुशर्रफ से पूछा कि मैं कश्मीरी पंडित हूं, मेरा घर श्रीनगर में है, लेकिन मैं अपने घर नहीं जा सकती, होटल में रुकना पड़ता है, वहां जाना नामुमकिन ंहै। आप बता सकेंगे कि क्या हम वहां लौट सकेंगे? मुशर्रफ एक क्षण को सन्नाटे में आ गए। पे्ररणा कौल के सवाल का जवाब भारत को भी देना होगा। वे लोग जो चुनाव लड़ रहे हैं वे जब भारत में ही हिंदुओं की रक्षा नहीं कर पाते और बेघर कर दिए गए हिंदुओं को अपने ही देश में अपने घर नहीं लौटा पा रहे हैं तो उनसे पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदुओं को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? भारत के राजनेता एक ऐसी आत्मदैन्यता से ग्रस्त हैं कि यदि प्राचीन सांस्कृतिक नगर अनंतनाग को इस्लामाबाद करने का प्रस्ताव कश्मीर विधानसभा में आए या कंधमाल में हिंदुत्वनिष्ठ कार्यकर्ता प्रभात पाणिग्रह की हत्या कर दी जाए तो खामोशी छाई रहती है, लेकिन एक वरुण गांधी के बयान पर उन्हें अस्पृश्य बनाने की कोशिश होती है। क्यों? जिन्होंने वरुण गांधी का विरोध किया, क्या उन्होंने एक बार भी पीलीभीत में हिंदुओं की दीन-हीन स्थिति का सर्वेक्षण करने की जरूरत समझी? पीलीभीत से कासरगौड़ (केरल) तक ऐसी ही स्थिति है। मैं पिछले दिनों महाराष्ट्र में लातूर और जालना के प्रवास पर गया था। वहां के स्थानीय समाचार पत्र इस प्रकार के समाचारों से भरे हुए थे कि स्थानीय मुस्लिम युवकों को लव जिहाद के लिए पैसे दिए जा रहे हैं ताकि वे कालेज जाने वाली हिंदू लड़कियों को प्रेम-पाश में फंसाकर मतांतरित कर शादी कर लें। इसकी छानबीन कौन करेगा? इस हिंदू बहुल देश की राजनीति में सब दलों में हिंदू होने के बावजूद हिंदू वेदना के प्रति इतनी उपेक्षा क्यों दिखती है? (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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