शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे

पिछले काफी समय से कांग्रेसी, वामपंथी और सत्ता में उनके साथी इस जुगाड़ में थे कि उनके मुख से आतंकवादियों के समर्थक और उनके प्रति नरम रुख अपनाने का कलंक कैसे मिटे ? २९ सितम्बर को हुए मालेगांव कांड में कुछ हिन्दू क्या पकड़े गये, उन्होंने इस आरोप के घेरे में सम्पूर्ण संघ परिवार को ले लिया है।

सच तो यह है कि गत पांच साल के कांग्रेस और वामपंथियों के शासन में सैकड़ों विस्फोट हुए; पर एक भी अपराधी को सजा नहीं दी जा सकी। सिमी, इंडियन मुजाहिदीन आदि मुस्लिम आतंकी गिरोहों के सैकड़ों लोग पकड़े गये हैं; पर इन पर कार्यवाही होना तो दूर, अपनी जान गंवाकर इन्हें पकड़ने वालों पर ही संदेह किया जा रहा है। लालू, मुलायम, ममता, शिवराज पाटिल, रामविलास आदि भूलते हैं कि वे इन सुरक्षाकर्मियों के कारण ही सुरक्षित हैं। इसके बाद भी इन पर झूठे आरोप लगा रहे हैं।

मुस्लिम वोट के लालच में आतंकियों के समर्थन का अगला चरण है हिन्दू संस्थाओं को कोसना। हर भगवा वेशधारी उन्हें कूपमंडूक और देशद्रोही नजर आता है। हिन्दू की बात बोलने वाला हर संगठन उन्हें भारत को मुस्लिम और ईसाई देश बनाने की राह में बाधा लगता है। इसलिए उन्हें गाली दिये बिना उनका खाना हजम नहीं होता। ये हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबल्स के कलियुगी चेले हैं। उसका मत था कि यदि झूठ को सौ बार बोलें, तो वह सच हो जाता है। उसकी दूसरी मान्यता यह थी कि झूठ इतना बड़ा बोलो कि घोर विरोधी भी उसका दस-बीस प्रतिशत तो सच मान ही ले।

उनका यह रवैया सदा से रहा है। गांधी जी के हत्यारे नाथूराम ने स्पष्ट कहा था कि यह काम उसने अपनी इच्छा से किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इसमें कोई हाथ नहीं है। न्यायालय ने भी संघ को निर्दोष पाया, नेहरू सरकार ने ही संघ से प्रतिबंध हटाया, फिर भी आज तक संघ को उस हत्याकांड में घसीटा जाता है। कई लोगों को इस कारण न्यायालय में माफी मांगनी पड़ी है, फिर भी वे अपने झूठ पर डटे हैं। यही हाल उड़ीसा में आस्टे्रलिया के पादरी ग्राहम स्टेंस के साथ हुआ। उसके हत्यारोपी दारासिंह ने न्यायालय में यह स्वीकार किया कि उसका बजरंग दल से कोई संबंध नहीं है; पर यह झूठ भी आज तक संघ परिवार पर चिपका हुआ है।

जहां तक किसी संस्था का हिंसक होने या न होने का संबंध है, उसे निम्न कुछ कसौटियों पर कसा जा सकता है।

१. क्या उसके अधिकृत साहित्य में हिंसा को उचित बताया है ?

२. क्या उसकी गतिविधियां गुप्त हैं ?

३. क्या किसी स्थान पर हुई हिंसा के लिए उसके किसी पदाधिकारी ने निर्देश जारी किया ?

४. क्या हिंसा के लिए उस संस्था ने प्रशिक्षण दिया ?

५. क्या संस्था ने शस्त्र या विस्फोटक सामग्री उपलब्ध करायी ?

६. क्या संस्था ने हिंसा या विस्फोट के बाद उसकी जिम्मेदारी ली ?

७. क्या संस्था ने अपराधियों को छिपने या भागने में सहयोग दिया ?

८. क्या संस्था ने मुकदमे में अपराधियों को कानूनी सहायता उपलब्ध करायी ?

ऐसी अनेक कसौटियां हैं, जिनके आधार पर इन आतंकी घटनाओं के बाद उन संस्थाओं को परखा जा सकता है। इस दृष्टिकोण से संघ परिवार की संस्थाओं पर निगाह डालें, तो ध्यान में आएगा कि

१. संघ की शाखाएं खुले मैदान में लगती हैं, जिसमें कोई भी हिन्दू आ सकता है।

२. संघ और उसके समविचारी संगठनों के कार्यक्रम प्राय: सार्वजनिक होते हैं, जिनके निमन्त्रण पत्र छपते हैं।

३. संघ परिवार की संस्थाओं के प्रशिक्षण शिविर गुप्त नहीं होते। उनके उद्घाटन और समापन पर समाज के प्रतिष्ठित लोगों तथा पत्रकारों को बुलाया जाता है। उसमें पारित प्रस्ताव पत्रकारों को उपलब्ध कराये जाते हैं। इन संस्थाओं का विस्तृत ब्यौरा इनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में उपलब्ध है, जिन्हें कोई भी खरीद सकता है।

४. बजरंग दल या दुर्गा वाहिनी जैसे युवा संगठनों के शिविर में एयर गन से निशानेबाजी सिखायी जाती है। यह अपराध नहीं है। भारत के हर नगर और गांवों के मेलों में ऐसी दुकानें लगती हैं।

५. अभी तक की जानकारी के अनुसार विद्यार्थी परिषद या बजरंग दल ने किसी हिंसक घटना की जिम्मेदारी नहीं ली। किसी को इसके लिए सामान उपलब्ध नहीं कराया, किसी की छिपने या भागने में सहायता नहीं की तथा किसी अपराधी को कानूनी संरक्षण नहीं दिया।

दूसरी ओर सिमी, इंडियन मुजाहिदीन जैसे मुस्लिम या माओवादी कम्युनिस्ट गिरोहों पर निगाह डालें, तो यह परिदृश्य नजर आता है।

१. इन संस्थाओं का सारा काम गुप्त रूप से होता है।

२. हर विस्फोट या आतंकी घटना के पहले और बाद में ये पुलिस को फोनकर उसकी जिम्मेवारी लेते हैं।

३. आंतकियों को गुप्त प्रशिक्षण और सामग्री देने से लेकर भागने, छिपने और पकड़े जाने पर कानूनी सहायता देने में ये आगे रहते हैं।

मालेगांव कांड में कुछ हिन्दुओं की गिरफ्तारी के बाद मुस्लिम वोटों के लालची नेता और गोयबल्स के चेले संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पर आरोप लगाने लगे हैं। इनकी शह पर नासिक में विश्व हिन्दू परिषद और विद्यार्थी परिषद के कार्यालय पर हमले भी किये गये हैं। वे यह भूलते हैं कि सार्वजनिक संगठनों से लाखों लोग जुड़ते हैं; पर उनके हर काम का जिम्मेदार वह संगठन नहीं होता।

कानपुर में दो युवकों की बम बनाते हुए मृत्यु हुई। कहते हैं कि उनमें से एक सालों पहले बजरंग दल से सम्बद्ध था। तो क्या पूरे बजरंग दल को आरोपी मान लें ? मालेगांव कांड में प्रज्ञा सिंह को संदेह के आधार पर पकड़ा गया है। वह छात्र जीवन में विद्यार्थी परिषद के सम्पर्क में रही होगी। तो क्या पूरे विद्यार्थी परिषद को कटघरे में खड़ा कर दें ? चोरी, डकैती आदि के आरोप में गिरफ्तार लोग कांग्रेस, सपा, बसपा या अन्य किसी दल के समर्थक होते हैं, तो क्या इस आधार पर पूरे दल को अपराधी मान लिया जाएगा ? क्या अपराधी का किसी राजनीतिक दल के नेता के साथ चित्र खिंचवा लेने मात्र से उन नेता को भी अपराधी मान लिया जाएगा ? इस प्रश्न का उत्तर इनमें से किसी के पास नहीं है।

हिन्दू संस्थाओं को झूठे संदेह के आधार पर गरियाना और मुस्लिम, ईसाई या हिंसक कम्युनिस्ट गिरोहों को पुष्ट प्रमाणों के बाद भी कुछ न कहना कहां का न्याय है ? उड़ीसा पुलिस को वह कार्यवाही पुस्तक मिली है, जिसमें स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के लिए २३ अगस्त २००८ की तारीख तय की गयी थी। साप्ताहिक पांचजन्य तथा अनेक पत्रों में यह प्रकाशित हुआ हैं; पर इस बारे में केन्द्र शासन, ईसाई संस्थाएं और उनके विदेशी आका मौन हैं।

केरल, बंगाल और त्रिपुरा में कम्यूनिस्टों द्वारा प्राय: हिन्दू कार्यकर्ताओं की हत्या की जाती है; माओवादी और नक्सली कम्यूनिस्ट देश के अनेक भागों में हिंसक कार्यवाहियों में लिप्त हैं। प्रमाण होने पर भी इस बारे में कुछ नहीं होता। क्या सिर्फ इसलिए कि इनका सत्ता दल को समर्थन प्राप्त है और संघ परिवार के संगठन किसी राजनीतिक दल, यहां तक कि भाजपा की भी जेब में रहना पसंद नहीं करते।

इन सेकुलरों को शायद यह नहीं पता कि आम हिन्दू भारत को अपनी मातृभूमि मानता है। अपवाद सब जगह होते हैं; पर वह इस देश को हानि पहुंचाने की बात सपने में भी नहीं सोच सकता, जबकि अन्य मजहबी गिरोहों के साथ ऐसा नहीं है। ऐसे में दोनों को तराजू के एक पलड़े में रखना अनुचित है। फिर जिन लोगों या संगठनों को अपना काम हर ओर फैलाना है, वे गुप्त रूप से काम नहीं कर सकते।

आजादी के लिए क्रांतिकारियों और गांधी जी ने अलग-अलग तरह से काम किया। गुप्त गतिविधियों के कारण क्रांतिकारियों को जनता का सहयोग बहुत कम मिला, जबकि गांधी जी के आंदोलन सार्वजनिक होने से जनता उनमें उमड़ पड़ती थी। संघ भी अपने विचार को सैकड़ों संस्थाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहा है, ऐसे में वह गुप्त गतिविधि कर ही नहीं सकता।

सारे परिदृश्य को देखने से यह साफ नजर आता है कि केन्द्र शासन में असली आतंकी गिरोहों के प्रति कठोर कार्यवाही करने का न साहस है और न इच्छा शक्ति। वे आम जनता का ध्यान अपनी असफलता से हटाने के लिए हिन्दू संस्थाओं को घेर रहे हैं। यदि प्रज्ञा और उनके कुछ साथी अपराधी हैं, तो उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही होनी ही चाहिए। नि:संदेह उसने भगवा वस्त्र की गरिमा को ठेस पहुंचाई है; पर इसके बहाने देशभक्त हिन्दू संगठनों के विरुद्ध शोर मचाना 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे` ही कहा जाएगा।
by लोकमंच

1 टिप्पणियाँ:

चन्दन चौहान ने कहा…

में सोचता था में ही सिर्फ सच्ची बाते लिख रहा हू बधाई हो आप भी हो इस लिस्ट में। मेरा ब्लाग है

http://ckshindu.blogspot.com

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