शुक्रवार, 7 नवंबर 2008

अमंगल की आहट

अमंगल की आहट मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में साध्वी प्रज्ञा तथा कुछ अन्य हिंदुओं की गिरफ्तारी पर मचे शोर-शराबे के बीच हमारे समक्ष यह सवाल उभरा है कि क्या हिंदुओं के भीतर भी आतंकवाद का कीड़ा अंतत: रेंग गया अथवा यह अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपने पाले में खींचने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की एक और साजिश है? उम्मीद है कि जिन लोगों के पास इस मामले की जांच का जिम्मा है वे उस हायतौबा से प्रभावित हुए बिना अपना कार्य करेंगे जो इस प्रकार की परिस्थितियों में संघ परिवार को लेकर छद्म सेकुलर ब्रिगेड की ओर से सुनने को मिलती रही है। जांचकर्ताओं को ऐसे सबूत एकत्र करने होंगे जो न्यायिक समीक्षा के समक्ष टिक सकें और उन लोगों के कामों पर पूरी रोशनी डाल सकें जिन्हें गिरफ्त में लिया गया है और इस पर भी कि किन कारणों से वे आतंकवादी तौर-तरीके अपनाने की ओर उन्मुख हुए। आतंकवाद पर राजनीति ने केंद्र सरकार की विश्वसनीयता को इस हद तक क्षति तक पहुंचाई है कि कोई भी उन सूचनाओं पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं जो इस मामले में सामने लाई गई हैं। जब जांच की संभावित दिशा की शुरुआती खबरें सामने आईं तो पूरे देश के हिंदू यह जानकर सन्न रह गए कि इस समुदाय के कुछ लोग, जिनमें एक साध्वी तथा सेना के कुछ पूर्व व वर्तमान अधिकारी शामिल हैं, महाराष्ट्र के मालेगांव तथा गुजरात के मोदसा में हुए बम धमाकों के सिलसिले में जांच के घेरे में हैं। यह शुरुआती आश्चर्य अब संदेह में बदलने लगा है। जो लोग इस मामले में सरकार के रुख को स्वीकार करने के लिए तैयार थे, अब अचानक अनेक कारणों से घटने लगे हैं। इसका मुख्य कारण सत्ताधारी गठबंधन के इरादों पर घटता विश्वास तथा देश को एक व सुरक्षित बनाए रखने में उसकी असफलता है। संप्रग की विश्वसनीयता पिछले छह माह में एकदम से घटी है। इसके कारणों को जानना कठिन नहीं है। सबसे पहला है इसकी अक्षमता। दूसरा कारण है उन लोगों के संदिग्ध इरादे जो आज हम पर शासन कर रहे हैं। कानून एवं व्यवस्था तथा आर्थिक मोर्चे पर असफलता अक्षमता के क्षेत्र में आती है। जो लोग सत्ता संभाले हुए हैं उनका रिकार्ड बेहद निराशाजनक है। दूसरा कारण कहीं अधिक खतरनाक है। यह हमारे सत्ता संचालकों की हानिकारक प्रकृति सामने लाता है। यह इसलिए ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह उस सबको तबाह कर सकता है जो हमने पिछले साठ वर्षो में संजोया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार के भीतर की इस खतरनाक सोच का सबसे पहले संकेत तब दिया था जब उन्होंने यह स्तब्धकारी घोषणा की थी कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है। मैंने इससे अधिक निर्रथक बयान कभी नहीं सुना। यदि इस टिप्पणी के बाद भी मनमोहन सिंह अपने पद पर बने रह सके तो सिर्फ इसलिए कि हिंदू समाज में लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह चिंता की बात है कि हिंदू समाज की इस विशेषता पर आंच आने लगी है। मनमोहन सिंह ने जिस एजेंडे की शुरुआत की उसे उनके साथियों ने खूब आगे बढ़ाया। हिंदुओं के मन-मस्तिष्क में आ रहे परिवर्तन की यही मुख्य वजह है। सत्ताधारी गठबंधन के इस एजेंडे को राजेन्द्र सच्चर समिति की रिपोर्ट से और अधिक आगे तक ले जाया गया, जो देश में मुस्लिमों की दशा से संबंधित थी। खुद गैर-जिम्मेदार तरीके से काम करने वाली यह समिति सशस्त्र बलों में सांप्रदायिक आधार पर गिनती के पक्ष में थी। समिति ने जो रिपोर्ट पेश की उसमें मुस्लिमों की तथाकथित दुर्दशा के लिए हर किसी पर आधारहीन आरोप लगाए गए। तुष्टीकरण के मामले में प्रधानमंत्री के रुख से उत्साहित कैबिनेट के अन्य सदस्य और अधिक आगे बढ़ गए। उन्होंने देश की एकता, सेकुलर ताने-बाने तथा विधि के शासन को कहींअधिक गंभीर क्षति पहुंचाई। जिस अबू बशर को पुलिस ने अहमदाबाद और बेंगलूर बम धमाकों के मास्टरमाइंड के रूप में चिह्नित किया उसके परिजनों के प्रति संवेदना जताने में संप्रग सरकार के मंत्री एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में जुट गए। अहमदाबाद और बेंगलूर के बम धमाकों में सौ से अधिक लोग मारे गए थे और अनगिनत लोग घायल हुए थे। अबू बशर की पक्षधरता करने वाले मंत्री लालू प्रसाद यादव तथा रामबिलास पासवान ने बाद में जामिया नगर मुठभेड़ पर सवाल उठाने शुरू कर दिए, जिसमें दिल्ली पुलिस के एक बहादुर अधिकारी को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इन सभी घटनाओं ने हिंदुओं के मन को बहुत अधिक आघात पहुंचाया। यह संभव है कि इन घटनाओं ने बहुसंख्यक समुदाय को हिंसा की ओर मोड़ दिया हो। शायद इसीलिए वे लोकतांत्रिक जीवनशैली से दूर हो रहे हैं। अन्यथा और किस तरह साध्वी प्रज्ञा, जिन्होंने धर्म और अध्यात्म के लिए संन्यास ग्रहण कर लिया तथा देश प्रेम और अनुशासन का प्रतीक माने जाने वाले सैनिकों में से कुछ की आतंकी साजिश में लिप्तता की व्याख्या की जा सकती है? अंत में कुछ बातें लोकतंत्र और उस तत्व की जो भारत और अमेरिका जैसे देशों में लोकतंत्र को टिकाए रखने का आधार है। यह है संविधान। भारत, अमेरिका, सऊदी अरब या पाकिस्तान या अन्य कोई भी देश हो, उसका संविधान समाज में बहुमत की इच्छा को परिलक्षित करता है। हर तरह की समानता की गारंटी देने वाले भारत और अमेरिका सरीखे लोकतांत्रिक संविधान वास्तव में बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों को दिया गया उपहार है। यदि भारत के हिंदू पाकिस्तान के मुस्लिमों के समान संकीर्ण मानसिकता वाले होते तो हमें ऐसा संविधान नहीं मिला होता जो मानवता द्वारा व्यक्त किए गए अनेक महान विचारों को अपने अंदर समेटे हुए है। चाहे भारत हो या अमेरिका अथवा कोई अन्य देश, बहुसांस्कृतिक समाज में इस प्रकार के संविधान का टिके रहना इस पर निर्भर करता है कि उस देश की राजसत्ता की प्रकृति क्या है? वह संविधान को किस रूप में इस्तेमाल करती है? राजसत्ता को बहुमत का विश्वास हासिल होना चाहिए। जब बहुमत राज्य में विश्वास खो देता है तो लोकतंत्र अव्यवहारिक तथा निष्कि्रय हो जाता है। यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई तो एकदम ढांचागत परिवर्तन उत्पन्न हो सकते हैं और इसका पहला निशाना संविधान तथा लोकतंत्र ही बनेगा। साध्वी की गिरफ्तारी तथा सेना के कुछ पूर्व तथा वर्तमान सदस्यों की इस साजिश में संभावित संलिप्तता की बातें इस बात का पर्याप्त संकेत दे रही हैं कि राज्य पर बहुमत का विश्वास घटने लगा है। यह चिंताजनक स्थिति है, जिसकी अनदेखी नहींकी जानी चाहिए। इसमें अधिक संदेह नहीं कि इस स्थितिके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनके कुछ गैर-जिम्मेदार सहयोगी जिम्मेदार हैं, जो आतंकियों के परिजनों के प्रति तो संवेदना प्रकट करते हैं, लेकिन आतंक से प्रभावित लोगों के परिजनों के प्रति नहीं। यदि शांति प्रिय हिंदू समाज में से कोई आतंकी कृत्यों की ओर मुड़ा है तो हमें आत्मचिंतन करना होगा। इसके पहले कि सामाजिक सुनामी लोकतंत्र,पंथनिरपेक्षता तथा उदारवाद के रूप में हमारे उन मूल्यों को तबाह कर दे जिन्हें हम सबसे अधिक सम्मान देते हैं, हमें सावधान होना होगा।
by jagran

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